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22 Sep 2022 · 3 min read

🌺🌸प्रेम की राह पर-65🌸🌺

उस आशा की प्रबल नींव को महाप्रबल करने की अपेक्षा तुमने बार-बार और समय-समय पर शब्दों के स्वपरीक्षित कंपन्न से जो हिलाया था।उस आशा की नींव में अब दरार का चित्रण उपस्थित है।तो संशय के साथ अब कोई कैसे प्रेमभवन का निर्माण करेगा उस पर।कोई कैसे अब उस भवन की तुम्हारे द्वारा पूर्व भंग की गई दीवारों पर संवाद का वज्रचूर्ण लेपन कर सकेगा।यह सब समय निगल जाएगा।समय यह सब निगलकर उगलेगा प्रायश्चित।वह प्रायश्चित अश्रु की धार न प्रवाहित करेगा।वह प्रवाहित करेगा यदा-कदा एकार्द्ध अश्रु,वह भी एकान्त में।देखना उन्हें,सम्भालना उन्हें,सुरक्षित करना उन्हें और रखना उन्हें हृदय की कोटर में वे मोती बन जायेंगे।फिर पिरोना उनकी माला पहन लेना उन्हें अपने गले में अदृश्य रूप से।क्या तुम रुक्मवर्णीय आभा लिए हुए हो।या रजतवर्णीय हो।क्या बोलते समय तुम्हारे मुँह से तूर्यनाद निकलता है।यह सब अट्टहास करने का समय नहीं है।तुम्हारी मुस्कुराहट कुचल दी जाएगी।अब तुम उस संजाल के स्वामी हो जहाँ से तुम्हारा ही सार्वजनिक पतन शुरू होगा।क्या तुम हुताशन हो।या फिर तुम्हारा अशनि जैसा स्वभाव है।उस चाहना को नष्ट कर दो जिसके विषय में तुम स्वयं अन्धे बने हुए हो।जब चाहना का कोई श्रम तुमसे प्रवर्तित न हो सका तो उसके प्रति तुम्हारा कटु व्यवहार भी उचित नहीं।तो चाहना की प्राप्ति में उस सरल भाव का आन्दोलन भी कुछ न कर सकेगा जिसका उसके प्रति में कोई सम्बन्ध विशेष न हो।निर्णायक बनो किसी भी क्षेत्र में।उलझाव से कोई उद्देश्य सफल न होगा।सफलता की कहानी का कोई ककहरा नहीं है।सुलझते और सुलझाते हुए,अपने लक्ष्य को एकीकृत करो।उस बोध का कोई प्रयोजन न होगा जिसमें परमार्थ की ज्योति न जली हो।सुख का रूप और सन्तोष का प्रश्रय कभी दीपक को ‘दीपक तले अँधेरा’ से दुःख नही देता है।लोग इसे वक्तृता से जोड़ भले ले।यह दीपक का परमार्थ है।जो क्योंकर किसी को प्रकाश के आश्रय से वंचित करे।करो उद्घोष सर्वदा उस घटना का जिसका कोई गवाह ही नही।ईश्वर तो हमारे सब अच्छे बुरे का प्रत्यक्ष है।तो या तो तूष्णीक बनकर उस बोध को अज्ञान की भीति समझकर सहन कर लें या फिर ईश्वर का आलम्बन स्वीकार करें और उसे स्वहृदय में ही प्रदर्शित करें।चिन्तनशून्य हो जाना ध्यान की अवस्था है समाधि की नहीं।मैं तो कहूँगा कि मैं तो आत्महारा हूँ और तुम स्वहारा हो।तुम्हें अब अपनी पड़ी है।हे फट्टू!परमार्थ पर विजय का लेपन न करो।तुम्हारी समाज सेवा के तीतर उड़ चुके हैं।बची अब शिक्षा तो गाँव पहुँचकर अगले लेख में तुम्हारे लिए शानदार रोजगारों का स्वर्णाक्षरों में विस्तृत और तार्किक साधन उपस्थित किये करेंगे।चयन तुम्हें करने होंगे।फिर देखना,हे मञ्जु!विकच होता तुम्हारा सिर बहुत खुश होगा।कहेगा मनाओ अपनी युवावस्था की अन्तिम श्वासों का मातम।वे श्वास तुम्हें आह्लाद न देंगी।चढ़ जाना बबूल पर और दांतून तोड़ना।क्यों पूछों?अब अगला क्रम तुम्हारे दाँतों के उन्मूलन का है।जब व्यक्ति का मन और हृदय दोनों साफ हो तो उस व्यक्ति का एकान्त में बैठकर चित्र देखने पर भी बहुत शान्ति मिलती है।तुम उस कुरूपता की वाहक हो जो बाहर और अन्दर एक है।नाखून खोंसने के लिए उत्तम हैं।उड़ते हुए बालों को रोकने का प्रयास किया जा रहा है।चार आँखें तो पहले से ही हैं।कहीं एक न रह जाए।यदि सीधी और स्वच्छ वार्ता कहें तो कहीं कानी न हो जाओ।ज़्यादा बनने से कोई लाभ नहीं है।तो हे टमटू!तुम्हारा हृदय शिला ही है।उसमें सम्वेदनाऐं किसी भी स्तर पर हैं हीं नहीं।यह तो स्वयं लिखते ही हो कि मैं बहुत जिद्दी हूँ।तो सुनो समय रूपी अपमार्जक और उपस्थित हुईं विषम परिस्थितिरूपी दण्ड सभी जिद्दी दागों को छुड़ा देते हैं।तो तुम किसी भी जुगाड़ में न रहना।तुम्हारा सभी जिद्दीपन अंतरिक्ष में चला जायेगा।हे घण्टू!कोई नशेड़ी दमादम करेगा और कराएगा तुम से।देख लेना।हमारा काम तो चौकस है।हे रूपा!सुनो अपनी डिग्री यूकेलिप्टस के पेड़ पर टाँग लेना गाँव जाकर।गाँव के लोगों से कहना देखो यह है मेरी बेरोज़गारी।हीही।कोई बात नहीं चिन्ता न करो बकरियाँ पाल लेना।बकरियों का खाद बहुत काम में आता है खेती में।तुमसे और क्या कहा जाए, तुमने अपनी घटिया सोच से निर्विवाद प्रेम को विवाद बना दिया।जूती का प्रहार करेंगी।आए हाए।चिन्ता न करो।सब गुमाँन धुआँ धुआँ हो जाएगा।तुम्हारे दम्भ की दीवारें जब टूटेंगी तो उस सरल हृदय मानव के हृदय से प्रार्थित तुम्हारे लिए प्रेम का भवन निकलेगा पर तब तक उस भवन की सभी दरवाज़े बन्द हो जायेगें स्वतः ही रुष्ट होकर।बड़ी चतुराई से।फिर भटकना इस संसार में अपने क्षुद्र प्रमाणों के साथ।तुम न जा सकोगे किसी देवालय में।वहाँ प्रथम आवेदन मेरा ही मिलेगा।अपने क्षुद्र ज्ञान के क्षुद्र जल श्रोत में डूबी “फट्टू”।ही ही।🤜🤜🤜🤜🤜

©®अभिषेक पाराशर

Language: Hindi
59 Views
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