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2 Dec 2022 · 1 min read

■ ग़ज़ल / बात बहारों की…!!

■ ग़ज़ल / बात बहारों की…!!
【प्रणय प्रभात】

★ बेशुमार चोटें खाई हैं कई क़रारों की।
जगह कहां है इस दिवार में और दरारों की?

★ चप्पे-चप्पे पर पतझड़ की पहरेदारी है।
हम किस मुंह से करें बताओ बात बहारों की?

★ तर्पण से पुरखों को पानी कोरी बातें हैं।
बहती नदियां बुझा ना पाईं प्यास किनारों की।।

★ सचमुच बड़ी हंसी आती है अक़्ल के अंधों पर।
गिरे हुए हैं अंधकूप में बात मिनारों की।।

★ दुल्हन है भगवान भरोसे राह विरानी है।
नीयत भी कुछ ठीक नहीं है आज कहारों की।।

★ लाखों रोग, करोड़ों रोगी, अरबों का ख़र्चा।
ठीक रहे आख़िर कैसे बस्ती बीमारों की?

★ जितना कपड़ा लगा सियासी झंडे-बैनर में।
उतने में ढंक जाती निश्चित देह हज़ारों की।।

★ फिर से लोकतंत्र के शव पर कौवे टूट पड़े।
कांव-कांव चुभती हैं आवाज़ें नारों की।।

★ सचमुच बड़ी हँसी आती है अक़्ल के अंधों पर।
गिरे हुए हैं अंधकूप में बात मिनारों की।।

★ औलादों के हाव-भाव पढ़ने में चूक गए।
वो जो भाषा पढ़ लेते थे चाँद-सितारों की।।

Language: Hindi
1 Like · 111 Views
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