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ज़िन्दगी

दीवारों के पीछे से
बंद दरवाज़ों के बीच
हल्की सी जगह से झांकती
ज़िंदगी

मुझसे पूछती है आज
क्यों हूँ मैं बंद यहाँ
इस अँधेरे कमरे में
क्यों खुद को छुपा रखा है
ज़माने की धूप से

बेखबर
क्यों हूँ मैं कि
मुझे ना है कोई फ़िक्र
अपनी और अपनों की
क्यों हूँ अनजान दर्द से खुद के
की चला जा रहा हूँ
बिखरे कांच के टुकड़ों पर

खुश नहीं हूँ
पर ख़ुशी के रास्तों को भी नहीं जानता
ग़म को मिटने का
कोई रास्ता क्यों नहीं निकालता

रोशनी
ज़रूरी है कि मैं कुछ देख पाऊँ
खुद से बाहर निकलूँ और
फ़िज़ा महसूस कर पाऊँ
फिर निकल आये पर मेरे
इस खुले आसमान में उड़ता
आज़ाद पंछी बन जाऊं
लौट जाऊं बचपन में
इस उम्र की ज़ंजीरें तोड़
अब लगता है मन में कहीं
कि बचपन में ही खुद को छोड़ आऊं

–प्रतीक

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