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5 May 2018 · 1 min read

ग़ज़ल

जान लो पत्थर में’ होती जान है
कंकड़ों में दीखते भगवान है |

ईँट पत्थर जोड़कर बनता भवन
जिंदगी में आदमी सामान है |

हो गया पत्थर सभी मानव यहाँ
आदमी में अब कहाँ ईमान है ?

कोशिशें करते रहे इंसान हों
जिंदगी शैतान की आसान है |

है पृथक खाद्य पहनावा सभी
भिन्नता में एकता पहचान है |

निर्धनों का बंद हो अब माँगना
आश्रमों का हो सहारा, मान है |

गर्व हमको है हमारे देश पर
यह तिरंगा ही हमारी शान है |

कालीपद ‘प्रसद’

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