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18 Feb 2023 · 1 min read

हाल-ए-दिल जब छुपा कर रखा, जाने कैसे तब खामोशी भी ये सुन जाती है, और दर्द लिए कराहे तो, चीखों को अनसुना कर मुँह फेर जाती है।

ये ज़िंदगी आस कुछ यूँ जगाती है, की राख बना मुझे उड़ा जाती है,
किनारा दिखा कर तूफानों में, साहिलों पर नाव डूबा जाती है।
उजड़े कारवाँ के मुसाफिरों को, घर की दीवारें दिखती है,
फिर उस घर को खंडहरों में तब्दील कर, कारवाओं में भी तन्हा छोड़ जाती है।
हाल-ए-दिल जब छुपा कर रखा, जाने कैसे तब खामोशी भी ये सुन जाती है,
और दर्द लिए कराहे तो, चीखों को अनसुना कर मुँह फेर जाती है।
दफ़्न हुई लाश को साँसें दे, उसे नए जीवन की रौशनी से मिलवाती है,
फिर अन्धकार भरी खाई में धकेल, कब्र पर उसके नाम कोई और लिख जाती है।
ठेस रूह पर हमारे लगाकर, गुनहगार भी हमें हीं ठहराती है,
तकदीर में मिलान की लकीरें दिखा कर, बिछड़ने का इतिहास हमें सुनाती है।
सपनों को नए रंगों की उड़ान देकर, आसमां की ऊँचाइयों पर ले जाती है,
फिर आँखों से यूँ नींदें चुराती है, की जमीं के एक टुकड़े के लिए हर धड़कन को तरसाती है।

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