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20 Jul 2016 · 1 min read

हमें कब तलक आजमाते रहोगे

हमें कब तलक आजमाते रहोगे
गिराते रहोगे उठाते रहोगे

बचाओगे कैसे मुहब्बत से दामन
अगर आप नज़रें मिलाते रहोगे

कि बेकार हो जायेगी सब दुआएँ
अगर दूसरों को सताते रहोगे

यक़ीनन अदावत ही बढ़ती रहेगी
समंदर जो खारा पिलाते रहोगे

मुआफ़ी न देगी कभी आदमीयत
जो हक़ दूसरों का दबाते रहोगे

किसी दिन ये कट जायेगा देख लेना
जो सर अपना यूँही झुकाते रहोगे

मुहब्बत की दौलत भी है ख़ूब ‘माही’
बढ़ेगी ये जितनी लुटाते रहोगे

माही

2 Comments · 243 Views
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