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26 May 2023 · 1 min read

हंस

हंस जो उतरा आसमान से
श्वेत रँग तेरे मन के जैसा
उतर धरा पर चुगता मोती
मोती भी देखो आंसू जैसा ।

हिरन के जैसी आँखे मेरी
आस बान्ध कर अब तक बैठी
जग मरुथल की तपती रेत पर
तलाश हो जैसे शीत जल की ।

आँखों में रब की सूरत है ऐसे
चकोर की आँख में चाँद हो जैसे
रीते हाथ की हर लकीर पर
हंस के मन की छाप हो जैसे ।

रब तुम जानो ‘हंस’ कौन है।
जाने क्यों अब भी वक़्त मौन है?
हम ने क्या जाना रब के खेल को
किस्मत और इस वक़्त के मेल को,

हंस तो फिर आया धरा पर
बूंद ओस की चुगता रहता
जोड़ा हंस का उड़ा नहीं है
पंख फैला धरा पर रहता ।

———-डॉ. सीमा (कॉपीराइट)

Language: Hindi
134 Views
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