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28 Aug 2022 · 1 min read

साजिशें ही साजिशें…

साजिशें ही साजिशें…

साजिशें ही साजिशें।
हर तरफ हैं साजिशें।

चैन- सुकून लील रहीं,
रंजिशें औ साजिशें।

लग रहीं हर काम में,
तिकड़म औ सिफारिशें।

पूरी हों तो कैसे,
आसमां – सी ख्वाहिशें।

बढ़ा-चढ़ा चमक-दमक,
लगा रहे नुमाइशें।

कौन क्या गुल खिलाए,
नव नस्ल की पैदाइशें।

बंद पन्नों में पड़ीं,
अनसुनी सब नालिशें।

न जाने बरसें कहाँ,
खुदा तिरी नवाज़िशें।

सभी सुखी रहें यहाँ,
दिल की ये गुजारिशें।

बरसें सबके अँगना,
रहमतों की बारिशें।

© डॉ.सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ.प्र.)

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