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# सांग – देवी गंगामाई # अनुक्रमांक – 1 # पवन पवित्र बहता पाणी, आठो आम रहै चलता, परमगती से भारत के म्हां, गंगे धाम रहै चलता ।। टेक ।।

# सांग – देवी गंगामाई # अनुक्रमांक – 1 #

जवाब – सुखदेव मुनी का। (1)

पवन पवित्र बहता पाणी, आठो याम रहै चलता,
परमगती से भारत के म्हां, गंगे धाम रहै चलता ।। टेक ।।

विष्णु के चरण से निकली गंगा, ज्योतिष बेद-विधि का सार,
हजार चौकड़ी रही सुरग मै, फिर शिवजी नै ली जटा मै धार,
भागीरथ ल्याया मुक्ति पाग्ये, सघड़ के बेटे साठ हजार,
अमृतपान किया सूर्य नै, अंबो जल दिया बेशूमार,
सूर्य का अरथ-सुदर्शन चक्कर, सुबह तै शाम रहै चलता ।।

शक्ति चाली परमलोक मै, ब्रह्मा जी धोरै आई,
उड़ै किन्नर-गंर्धफ, खड़े देवते, ऋषियों की महफिल पाई,
एक राजऋषि का ध्यान डिग्या था, हूर पदमनी दर्शायी,
श्राप तै होया शांतनु राजा, वा होगी गंगा माई,
कर्म संयोग, विधि विधना की, जिक्र तमाम रहै चलता ।।

वशिष्ठ मुनि की गऊ नंदनी, वसु चुराकै लाये थे,
ऋषि कै श्राप तै आठ वसु तो, गंगा जी नै जाये थे,
गंगा जी नै सात वसु, जल कै बीच बहाये थे,
होया आठवां भीष्म राजा, फिर गंगा तै फरमाये थे,
दे वरदान एक पुत्र का, मेरा भी नाम रहै चलता ।।

कृपण का धन शुद्ध होज्या, दान-पुन्न मै लाये तै,
कपटी का भी मन शुद्ध होज्या, ज्ञान गुरू का पाये तै,
पापी का जीवन शुद्ध होज्या, ईश्वर का गुण गाये तै,
कोढी का भी तन शुद्ध होज्या, श्री गंगा जी मै न्हाये तै,
दया-धर्म और न्याय नीति पै, राजेराम रहै चलता ।।

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