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6 Feb 2017 · 1 min read

वो क़ीमत लगाने आ गए

बिक रहे थे जज़्बात मेरे
वो क़ीमत लगाने आ गए/
भर रहे थे जो ज़ख़्म मेरे
फिर से जगाने आ गए/
फूलों को महक रहा था
ख़ुशबू ही चुराने आ गए/
रोशन मेरे इस हौसले का
दीपक ही बुझाने आ गए/
बची हुई मेरी उम्मीदों पर
वो पानी फिराने आ गए/
मुश्किलों से ही लड़कर
बढ़ रहा पर आगे तो था/
बढ़ रही मेरी किश्ती को
बीच धार डुबोने आ गए/

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