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1 Jul 2022 · 1 min read

🚩वैराग्य

🧿१
भार्या का जब हो गया,अपने पति से योग।
फिर डर कैसा संत जी,क्यों है आत्म-वियोग।।
क्यों है आत्म-वियोग,बूंद को मिला समुंदर।
निज मन-मल तज आप ,बने उपकारी मंदिर। ।
‘नायक’ कह श्री क्रौंच, पूर्ण नश्वर यह काया।
कंत स्वयं जगदीश, आतमा उसकी भार्या।।
———–
👉उक्त कुंडलिया मेरी(पं बृजेश कुमार नायक की) कृति/खंडकाव्य/शोधपरकग्रंथ “क्रौंच सु ऋषि आलोक” के द्वितीय संस्करण की कुण्डलिया है।पृष्ठ संख्या 39

👉”क्रौंच सु ऋषि आलोक” शोधपरक ग्रंथ/खंडकाव्य का द्वितीय संस्करण साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से प्रकाशित है और अमेजोन-फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है।
—–
आचार्य पं बृजेश कुमार नायक
“एम.ए.हिंदी”
“विद्यावाचस्पति”
“विद्यासागर”
“द आर्ट ऑफ लिविंग” अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्था के संस्थापक एवं विश्व प्रसिद्ध योगी सदगुरु श्री श्री रविशंकर जी के शिष्य

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