Oct 19, 2016 · 1 min read

राजयोगमहागीता” ओंकार,अघनाशक,परमआनंदहैंजो( घनाक्षरी, पोस्ट५२- जितेन्द्र कमल आनंद

प्रभु प्रणाम
————- ओंकार, अघनाशक,परम आनंद हैं जो,
क्यों न करें भक्त यशगान आठों याम ही ।
देख – देख प्रभु प्रेम मूर्ति की सौंदर्य राशि ,
करते मधुप रस पान अविराम ही ।
सगुण साकार हैं जो गोविंद मुरारी श्याम ,
मन्मथहारी हैं जो ललित ललाम ही ।
भाग्य के विधाता विभु फलदाता कर्म के जो ,
क्यों न करें ऐसे श्रीकृष्ण को प्रणाम ही ।।

—– जितेंद्रकमलआनंद

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