Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
1 Oct 2023 · 2 min read

मैं पुरखों के घर आया था

पता पिता से पाया था
मैं पुरखों के घर आया था
एक गाँव के बीच बसा पर
उसे अकेला पाया था ।
माँ बाबू से हम सुनते थे
उस घर के कितने किस्से थे
भूले नहीं कभी भी पापा
क्यों नहीं भूले पाया था ।
जर्जर एक इमारत थी वो
पुरखों की विरासत थी वो
कितने मौसम बीत चुके थे,
पर उसे अकड़ता पाया था ।
दरवाजे हठ कर बैठे थे
कितने ऐंठे कितने रूठे थे
चीख चीख कर करें शिकायत
क्यों तुमने बिसराया था ।
द्वार खुले तो मिला बरोठा,
मुझे लगा वो भी था रूठा,
मुख्य द्वार पर बड़ा सा कोठा,
वो रोने को हो आया था ।
दीवारों पर लगे थे जाले
हठ करके न हटने वाले
जैसे धक्का देके भगाएँ
कितनी मुश्किल से मनाया था ।
कभी पिताजी ने बतलाया
इस कमरे में रहते थे ताया,
गजब रसूख था, गजब नाम था
पर अब वो मुरझाया था ।
उसके आगे एक बरामदा
उससे आगे था फिर आँगन
आँगन के आगे कुछ कमरे
वक़्त वहीँ ठहराया था ।
तभी वहाँ कुछ खनक गया था
शंखनाद भी समझ गया था
देखा वहाँ एक मंदिर था
मैं कितना हर्षाया था ।
उस आँगन के कितने चर्चे
सुने हुए काका के मुख से
कितनी रौनक होती थी ये
काका ने बतलाया था ।
तभी वहां कुछ हमने देखा
दीवालों पर बचपन देखा
पापा के हाथों की छापों पे
अपनी हथेलियाँ रख आया था ।
न थी लकड़ी धुआं कोयला
न चूल्हे की ठण्डी राख़
उस रसोई में प्यार पका था
जो था अब भी पर सकुचाया था ।
मोटी थी मिटटी की दीवारें
पर पक्के रिश्ते बसते थे
छूट गया था घर आँगन वो
बाबू ने भूल न पाया था ।
ड्राइंग रूम नहीं होते थे
एक हॉल में सब सोते थे
चिट्ठी के चट्टे अब तक थे
मैं कुछ को पढ़ आया था ।
उसी हॉल की दीवालों पर
पुरखों के कुछ चित्र लगे थे
मेरी आँखों से नीर वहा तब
मैं उन सबको ले आया था ।
पता पिता से पाया था
मैं पुरखों के घर आया था
एक गाँव के बीच बसा पर
उसे अकेला पाया था ।

(C)@दीपक कुमार श्रीवास्तव “नील पदम्”

8 Likes · 10 Comments · 1256 Views
📢 Stay Updated with Sahityapedia!
Join our official announcements group on WhatsApp to receive all the major updates from Sahityapedia directly on your phone.
Books from नील पदम् Deepak Kumar Srivastava (दीपक )(Neel Padam)
View all
You may also like:
"" *गणतंत्र दिवस* "" ( *26 जनवरी* )
सुनीलानंद महंत
मत कर ग़ुरूर अपने क़द पर
मत कर ग़ुरूर अपने क़द पर
Trishika S Dhara
आत्म  चिंतन करो दोस्तों,देश का नेता अच्छा हो
आत्म चिंतन करो दोस्तों,देश का नेता अच्छा हो
सुखविंद्र सिंह मनसीरत
फटे रह गए मुंह दुनिया के, फटी रह गईं आंखें दंग।
फटे रह गए मुंह दुनिया के, फटी रह गईं आंखें दंग।
*Author प्रणय प्रभात*
पुस्तकें
पुस्तकें
नन्दलाल सुथार "राही"
मां से ही तो सीखा है।
मां से ही तो सीखा है।
SATPAL CHAUHAN
संभल जाओ, करता हूँ आगाह ज़रा
संभल जाओ, करता हूँ आगाह ज़रा
Buddha Prakash
*पशु से भिन्न दिखने वाला .... !*
*पशु से भिन्न दिखने वाला .... !*
नेताम आर सी
ग़ज़ल
ग़ज़ल
ईश्वर दयाल गोस्वामी
मैंने खुद के अंदर कई बार झांका
मैंने खुद के अंदर कई बार झांका
ruby kumari
क्यों न्यौतें दुख असीम
क्यों न्यौतें दुख असीम
Umesh उमेश शुक्ल Shukla
अब समन्दर को सुखाना चाहते हैं लोग
अब समन्दर को सुखाना चाहते हैं लोग
Shivkumar Bilagrami
तेरा फिक्र
तेरा फिक्र
Basant Bhagawan Roy
बेवकूफ
बेवकूफ
Tarkeshwari 'sudhi'
" प्रिये की प्रतीक्षा "
DrLakshman Jha Parimal
राम भजन
राम भजन
आर.एस. 'प्रीतम'
कुछ लोग होते है जो रिश्तों को महज़ इक औपचारिकता भर मानते है
कुछ लोग होते है जो रिश्तों को महज़ इक औपचारिकता भर मानते है
पूर्वार्थ
*हमें कर्तव्य के पथ पर, बढ़ाती कृष्ण की गीता (हिंदी गजल/ गीतिका)*
*हमें कर्तव्य के पथ पर, बढ़ाती कृष्ण की गीता (हिंदी गजल/ गीतिका)*
Ravi Prakash
3334.⚘ *पूर्णिका* ⚘
3334.⚘ *पूर्णिका* ⚘
Dr.Khedu Bharti
हर हाल में बढ़ना पथिक का कर्म है।
हर हाल में बढ़ना पथिक का कर्म है।
Anil Mishra Prahari
पढ़ें बेटियां-बढ़ें बेटियां
पढ़ें बेटियां-बढ़ें बेटियां
Shekhar Chandra Mitra
"मधुर स्मृतियों में"
Dr. Kishan tandon kranti
एहसास.....
एहसास.....
Harminder Kaur
हमारी मां हमारी शक्ति ( मातृ दिवस पर विशेष)
हमारी मां हमारी शक्ति ( मातृ दिवस पर विशेष)
ओनिका सेतिया 'अनु '
चलो , फिर करते हैं, नामुमकिन को मुमकिन ,
चलो , फिर करते हैं, नामुमकिन को मुमकिन ,
Atul Mishra
क्या हुआ ???
क्या हुआ ???
Shaily
किसी से मत कहना
किसी से मत कहना
Dr.Pratibha Prakash
A Departed Soul Can Never Come Again
A Departed Soul Can Never Come Again
Manisha Manjari
ऐसी थी बेख़्याली
ऐसी थी बेख़्याली
Dr fauzia Naseem shad
नदी की तीव्र धारा है चले आओ चले आओ।
नदी की तीव्र धारा है चले आओ चले आओ।
सत्यम प्रकाश 'ऋतुपर्ण'
Loading...