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30 May 2018 · 1 min read

मैं तो प्रकृति हूं

मैं सब में हूं सबकी हूं सबको समर्पित हूं

प्रभु की अनमोल सौगात मैं तो प्रकृति हूं

***

अकूत अनगिनत वरदानों से अलंकृत हूं

मैं ही तो नीले गगन में तारों में अंकित हूं

***

सागरों की गहराइयों में तो सुसज्जित हूं

पाकर पहाड़ों की ऊंचाइयां असीमित हूं

***
आवारा बरसते बदलों में मैं तो द्रवित हूं

मैं तो कड़कती बिजलियों की कुपित हूं

***
हरे पेड़- पौधौं की हरियाली से हर्षित हूं

फूलों की विविधताओं पर प्रफुल्लित हूं

***

जीवन को प्राण देती वायु मैं तो गति हूं

दहकती आग की ज्वाला प्रज्वालित हूं

***

जीवन के हर पहलुओं में मैं संतुलित हूं

मैं ही तो जलचरों नभचरों में जीवित हूं

***

ये उदारता समानता पे आश्चर्यचकित हूं

दीन-दुखियों की पुकारें अप्रसन्नचित्त हूं

***

असमर्थों का तो मैं ही सामर्थ्य शक्ति हूं

प्रगतिपथ पर बढ़ों मैं तो अभिव्यक्ति हूं

***
सबकुछ अनिश्चित है मैं ही सुनिश्चित हूं

जनम-मरण हर कदम तो व्यवस्थित हूं

***

सन्तुलन की सीढ़ियों पे चढ़ी प्रगति हूं

तुम मुझ में रमो मैं तुम में मैं प्रकृति हूं

***

-रामचन्द्र दीक्षित ‘अशोक’

Language: Hindi
250 Views
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