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19 May 2018 · 1 min read

मीरा का प्रेम -आर के रस्तोगी

तुम मेरे आँख के काजल हो,सुन्दरता के लिए काजल नहीं लगाती हूँ
मेरी आँखों में सदा बसे रहे मनमोहन,इसलिए काजल मै लगाती हूँ

तुम मेरे मन का सांवरे हो,सावरियां बना कर तुम्हे रिझाती हूँ
इसलिए तानपुरा लेकर हाथ में,अपने मन को तुमसे मिलाती हूँ

छोड़ दिया घर-बार मैंने,तुमको ही अपना घर-बार समझती हूँ
मै तुम्हारी हूँ,तुम मेरे हो,इसलिए मै तुम्हे भजन सुनाती हूँ

राज-पाठ से मुझे क्या लेना,मै अपने सावरियां को सजाती हूँ
अपने कमरे को सेज बनाकर, उसे फूलो से रोज सजाती हूँ

खान-पान की कोई कमी नहीं,उनके लिए छप्पन भोग बनाती हूँ
पहले उनको स्वम भोग लगाकर,बाद में उस को खुद खाती हूँ

यही मेरी दिन प्रतिदिन की प्रक्रिया है,इसमें सदा मग्न रहती हूँ
ये दुनिया क्या कहती है मुझको,इसकी परवाह मै नहीं करती हूँ

आर के रस्तोगी
मो 9971006425 [/

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