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26 Jun 2023 · 1 min read

माॅं लाख मनाए खैर मगर, बकरे को बचा न पाती है।

माॅं लाख मनाए खैर मगर, बकरे को बचा न पाती है।
रस्सी जल जाती पर उसकी, ऐंठन न कभी भी जाती है।।
पुष्पित और पल्लवित होते, संस्कार मानव जीवन में ,
निर्भयता हो या कायरता, नर के भीतर से आती है ।।

महेश चन्द्र त्रिपाठी

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