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20 Mar 2024 · 1 min read

महाप्रयाण

माया , आसक्ति , काम, क्रोध , अहंकार ,
सब मानव निर्मित बंधन है ,

परोपकार , प्राणी मात्र से प्रेम, आत्मज्ञान , संवेदना , निर्विकार भाव,
सब मानव उत्थान के साधन है ,

जीवन एक भवसागर है ,
काया उसमें तरण करती हुई नौका है ,
जो समय के थपेड़ों को सहते हुए
आगे बढ़ती है ,

धैर्य की पतवार , आत्मविश्वास का संबल एवं दूरदृष्टि की सोच ,
इस नौका को अवसाद रूपी चट्टानों से
टकराकर मनोबल टूटकर बिखरने से बचाती है ,

नकारात्मक लहरों से सतत् सामना करने के लिए सकारात्मक सोच,
साहस संचरित कर षड्यंत्र रुपी भँवर में
नौका को डूबने से बचाती है ,

निस्पृह त्याग एवं बलिदान ,
मानव जीवन को सार्थक एवं श्रेष्ठ बनाकर ,
इस महाप्रयाण को सफल बनाती है।

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