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4 Feb 2024 · 1 min read

मन

4. मन

मन मानो मण-मण है
वास्तविकता जन-जन है।
खोता-पाता रचत -बिगाड़त,
सब खेल विधाता का तन-तन में है।

सोचत-सोचत तन बन तिनका,
मित मिला ना मोहे मनका।
निज नयना नीर नहीं भई ,
खोवत सोचत रैन बिसारी ।।

विधि विधाता लेख लखावै.
सोचतै मन हंसी खुद आवै।
बिफरता बेबस मन कहां जावै,
सौचत-रौवत हसत-हसावै ॥

कटीले कंकर कीट क्रिटिक पथ डारै ,
मृत मन ग्लानि, रीझत- रीझत मारै।
उठावत पत्थर के सिर झारै,
मलिन मन मनन कर मन न रिझावै ॥

सतपाल चौहान

Language: Hindi
3 Likes · 111 Views
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