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4 Jul 2018 · 1 min read

मंदसौर की दुर्घटना पर मनोभाव

आततायियों के हाथों कुचली गई मासूम बाला
सुनकर दरिंदगी अन्तस् में भीधधकलउठी ज्वाला ।

वहशियों की हरकतों ने कन्या को कुचल डाला
ख़ता क्या थी बालिका की, हाय! ये क्या कर डाला ।

क्रोध की अग्नि जल रही अन्तस् में पीड़ा उठ रही
घायल हो रहा तन- मन मानवता चीत्कार कर रही ।

छोटी- सी नाज़ुक कली ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?
कलुषित भावों पूर्ति हेतु क्यों उसको कुचल डाला ।

दुष्कर्म करते समय हाय! इनकी रूह भी नहीं काँपती
ईश्वर की कुदृष्टि भी इन पर क़हर नहीं बरपाती ।

इंसान शर्मसार हुआ. मानवता भी तार- तार हुई
ऐसा घोर कुकृत्य देख प्रकृति भी शर्मिंदा हुई ।

अबोध बच्ची पर न जाने क्यों ये जुर्म हुआ
न जाने क्यों आज इंसानों पर वहशीपन हावी हुआ ।

गगन भी सुन रो पड़ा धरा की रूह काँप उठी
झुलसी काया देख बच्ची काम. हर नारी ये बोल उठी ।

खुले आम घूम रहे हैं जो सिरफिरे व्यभिचारी
दुर्गा बन कर वध करें ख़त्म हो जाये विपदा सारी ।

नारी को ही रक्षा खातिर शस्त्र भी उठाना होगा
व्यभिचारों व नरपिशाचों का लहू अब बहाना होगा ।

अन्यथा नारी की कोख सूनी होने लग जायेगी
कोई भी माँ बेटी को धरा पर नहीं लाना चाहेगी

मंजु बंसल “ मुक्ता मधुश्री “
जोरहाट
( मौलिक व प्रकाशनार्थ )

Language: Hindi
1 Like · 1 Comment · 236 Views
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