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May 24, 2022 · 7 min read

*भक्त प्रहलाद और नरसिंह भगवान के अवतार की कथा*

*भक्त प्रहलाद और नरसिंह भगवान के अवतार की कथा*
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वृंदावन से पधारे आचार्य मुमुक्षु कृष्ण शास्त्री जी के श्रीमुख से भागवत कथा के श्रवण का सौभाग्य प्राप्त हुआ । अग्रवाल धर्मशाला, मिस्टन गंज ,रामपुर के सत्संग भवन में श्री राम सत्संग मंडल के तत्वावधान में भारत की सनातन संस्कृति और इतिहास के गौरवशाली पृष्ठ भागवत-कथा के माध्यम से खुलते चले गए ।
इस देश की धरती पर भक्त प्रहलाद का जन्म हुआ और उसकी रक्षा के लिए स्वयं भगवान ने एक पत्थर के खंभे में से ऐसा अद्भुत अवतार लिया ,जिस की गाथा हजारों वर्षों से यह देश गा रहा है और गाता रहेगा । जब तक भागवत कथाएँ होंगी , भक्त प्रहलाद और नरसिंह के अवतार की कथा लुप्त नहीं हो सकती ।
कितना सुंदर परिदृश्य है ! आचार्य श्री सुंदर सुसज्जित मंच पर विराजमान हैं। सामने श्रोताओं से भरा हुआ सभाकक्ष है । तीन घंटे तक लगातार भागवत कथा का प्रसंग चल रहा है । आचार्य श्री इसी देश की धरती पर जन्मे एक धर्मप्राण बालक की कथा सुना रहे हैं । एक ऐसा बालक जिस को उसके अहंकारी पिता ने यह समझाने के लिए गुरुकुल में पढ़ने भेजा कि वह इस बात पर विश्वास कर ले कि ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं होता है तथा उसके पिता हिरण्यकश्यपु ही इस संसार के मालिक हैं। वह बालक हिरणकश्यपु के विचार से सहमत नहीं था । उसके हृदय में परमेश्वर के प्रति लौ जल चुकी थी । उसने यह स्वीकार कर लिया था कि परमेश्वर ही इस संसार के मालिक हैं तथा सब कुछ उनकी मर्जी से ही होता है ।
कथा को विविध मोड़ों से प्रवाहमान करते हुए वक्ता महोदय ने बताया कि भक्त प्रहलाद अपने नगर में एक बार घूमते घूमते कुम्हार के पास पहुंच गया । वहाँ उसने देखा कि कुम्हार और उसके परिवार-जन भगवान का भजन कर रहे हैं । प्रहलाद ने कारण पूछा । कुम्हार ने बताया कि जब बर्तनों को पकने के लिए भट्टी में रखा गया तो दुर्भाग्य से कुछ बिल्ली के बच्चे भी उसमें चले गए और अब वह चिंतित है कि वह बिल्ली के बच्चे जीवित किस प्रकार निकल पाएँगे ? कुम्हार ने बताया कि भगवान में बहुत बड़ी शक्ति होती है और वह अनहोनी को होनी में बदल सकता है ,बिगड़ी को बना सकता है और सब प्रकार के चमत्कार इस संसार में उसके द्वारा संभव हैं । सचमुच चमत्कार हुआ और बिल्ली के बच्चे जब सुरक्षित रूप से बाहर निकल आए ,तब प्रहलाद की ईश्वर के प्रति भक्ति-भावना दृढ़ हो गई । एक भजन के माध्यम से आचार्य जी ने बताया कि :-
*प्रहलाद जी को लाग रही राम रटना*
अर्थात प्रहलाद के हृदय में राम-नाम की रट लगने लगी और वह निरंतर परमात्मा की भक्ति में डूबने लगा । उसकी यह भावना किसी भी प्रकार से उसके पिता को पसंद नहीं थी । लेकिन वास्तव में तो प्रहलाद का जन्म ही ईश्वर की आराधना के लिए हुआ था।
कथा सुनाते हुए वक्ता महोदय ने बताया कि प्रहलाद के जन्म से पूर्व उसकी माता ने अपने पति को 108 बार श्रीमन्नारायण भगवान के नाम के उच्चारण का जाप करवाया था । इसकी भी कथा बड़ी विचित्र है । प्रहलाद की माता को किसी संत ने बता दिया था कि अगर तुम्हारा पति 108 बार भगवान के नाम का जाप कर ले ,तब तुम्हारा जो पुत्र उत्पन्न होगा वह परम भक्त होगा । विधि का विधान देखिए, हिरण्यकश्यपु शक्ति संचय के लिए जंगल में तपस्या करने गया और जिस वृक्ष के नीचे वह तपस्या कर रहा था उसके ऊपर एक तोता बैठकर श्रीमन्नारायण भगवान का उच्चारण करने लगा । यह देखकर हिरण्यकश्यपु ने पेड़ बदल लिया । दूसरे पेड़ पर जाकर तपस्या करने लगा । किंतु तोता उस पेड़ पर भी श्रीमन्नारायण भगवान का उच्चारण करने लगा । हिरण्यकश्यपु ने कई बार पेड़ बदला लेकिन परिस्थितियाँ ज्यों की त्यों रहीं। दुखी होकर वह बिना तपस्या किए घर वापस आ गया। पत्नी ने कारण पूछा,तो हिरण्यकश्यपु ने बताया कि तोता *श्रीमन्नारायण-नारायण-नारायण* मंत्र का जाप कर रहा था । बस फिर क्या था ,हिरण्यकश्यपु की पत्नी बार-बार घुमा-फिरा कर अपने पति से पूछती रही कि तोता क्या जाप कर रहा था ? और इस तरह हिरण्यकश्यपु ने 108 बार इस बहाने से श्रीमन्नारायण भगवान के सुंदर नाम का जाप कर लिया । फल स्वरूप जो पुत्र उत्पन्न हुआ ,वह भक्त प्रहलाद था। जिसमें नैसर्गिक रूप से ईश्वर के प्रति समर्पित भाव विद्यमान था ।
गुरुकुल में आचार्यों के पास हिरण्यकश्यपु ने उसे ईश्वर के प्रति भक्ति से विरत रहने की शिक्षा-दीक्षा के लिए भेजा। वहाँ जाकर भी कुछ नहीं हो सका। उल्टे प्रह्लाद ने अपने सहपाठियों के बीच भी ईश्वर भक्ति की भावना प्रबल कर दी ।
परिणाम यह हुआ कि हिरण्यकश्यपु ने प्रहलाद को मृत्युदंड सुना दिया । उसे पहाड़ी से नीचे फिंकवाया गया किंतु आश्चर्यजनक रूप से परमात्मा ने उसे सुखमय गोद में उठा लिया। प्रहलाद को सर्पों से कटवाया गया लेकिन वह पुष्प-हार में बदल गए । प्रहलाद को तेल के खौलते कड़ाह में मार डालने का प्रयत्न किया गया किंतु वह भी विफल रहा। फिर होलिका को आमंत्रित किया गया लेकिन जब होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर लकड़ियों के ढेर पर बैठी तो स्वयं होलिका जल गई लेकिन प्रहलाद का बाल बाँका तक नहीं हो पाया। परिणाम यह निकला कि अब स्वयं उसने अपने हाथ से अपने पुत्र को मार डालने का निश्चय किया । प्रहलाद को एक खंभे से रस्सियों से बाँध दिया गया किंतु प्रहलाद बिल्कुल भी नहीं डर रहा था। हिरण्यकश्यपु तलवार निकालकर जैसे ही प्रहलाद को मारने के लिए आगे बढ़ा ,तत्काल मिट्टी के खंभे में से नरसिंह भगवान का प्रकटीकरण हो गया।
वक्ता महोदय ने इस बिंदु पर वेद का यह कथन भी प्रस्तुत किया कि *न तस्य प्रतिमा अस्ति* अर्थात ईश्वर की कोई प्रतिमा नहीं होती है। यह एक विरोधाभासी विचार लग सकता है कि जिसकी कोई प्रतिमा नहीं होती ,वह एक पत्थर में से कैसे प्रकट हो गया ? किंतु कथा का सार यही है कि पत्थर में भी विद्यमान होता है और वह पत्थर के भीतर और पत्थर के बाहर सब जगह रहता है ।
प्रहलाद में अपने पिता को बताया था कि ईश्वर सर्वत्र है और स्तंभ में भी विद्यमान है । 27 दिन तक नरसिंह भगवान का हिरण्यकश्यपु के साथ युद्ध हुआ। खंभे में से नरसिंह भगवान प्रकट हुए । हिरण्यकश्यपु को गोद में बिठाकर अपने नाखूनों से उन्होंने चीरफाड़ करके मार डाला । हिरण्यकश्यपु की कोई चतुराई काम नहीं आई । उसने वरदान लिया था कि वह मनुष्य या जानवर किसी के हाथ से नहीं मरेगा । अतः नरसिंह रूप के द्वारा उसे मरना पड़ा । वह दिन या रात किसी भी समय नहीं मरना चाहता था किंतु सायंकाल उसकी मृत्यु हुई । वह घर के अंदर या बाहर कहीं मरना नहीं चाहता था किंतु घर की देहरी पर उसे मारा गया । वह न हवा में और न जमीन में मरना चाहता था। उसे गोद में बिठाकर नरसिंह भगवान ने बिना अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग किए अपने नाखूनों से मार डाला । वह साल के किसी भी 12 महीने में न मरने का वरदान ले चुका था अतः उसे अधिक-मास अर्थात पुरुषोत्तम-मास अथवा लौंद के महीने में मारा गया ।
कथावाचक महोदय ने श्रोताओं को बताया कि चतुराई से किसी को अमरत्व नहीं मिल सकता। कथाओं के बीच-बीच में कुछ अन्य कथाएँ भी कथावाचक महोदय के श्रीमुख से वातावरण में बिखरती गईं और श्रोता उन से लाभान्वित होते चले गए ।
दूध में घी विद्यमान तो रहता है लेकिन दिखाई नहीं पड़ता, इस प्रकार की कथा को सार रूप में कथावाचक महोदय ने बताते हुए कहा कि जब योग की अग्नि से शरीर और मन को मथा जाता है तथा इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली जाती है तब अदृश्य परमात्मा का अनुभव होने लगता है ।
आपने बताया कि जीवन में कभी भी अपनी प्रशंसा के फेर में नहीं पड़ना चाहिए तथा दूसरे लोग अगर हमारी निंदा करते हैं तो इससे बड़ा मृत्यु के समान दुख दूसरा नहीं हो सकता ।
आपने वृक्षों की रक्षा का संकल्प श्रोताओं से प्राप्त किया और कहा कि हमें वृक्ष लगाने भी चाहिए और जो वृक्ष लगे हुए हैं उनकी रक्षा करने के लिए भी प्रयत्नशील रहना चाहिए अन्यथा एक दिन आएगा जब नदी और वृक्ष इतिहास का विषय बन जाएँगे और मनुष्य स्वच्छ वायु तथा निर्मल जल के लिए तड़प कर रह जाएगा ।
बीच-बीच में संगीतमयता के साथ कथावाचक महोदय वातावरण को रसमय बनाते गए । आपने बताया कि कोई भी संत कितना भी बड़ा क्यों न हो लेकिन वह स्वयं को भगवान घोषित नहीं कर सकता । वास्तव में तो हम भगवान के सेवक-मात्र ही हैं । इसी तरह गुरु भी जीवन में एक पथ-प्रदर्शक मात्र ही होता है । वह भगवान नहीं होता।
आचार्य श्री के साथ संगीत मंडली भी आई थी । उसी मंडली के एक सदस्य द्वारा ऊँची और गंभीर आवाज में अंत में एक भजन प्रस्तुत किया गया ,जिसके बोल थे :-
*वृंदावन के बाँके बिहारी*
*हमसे पर्दा करो न मुरारी*
अंत में *भागवत भगवान की है आरती* प्रस्तुत की गई ।
समारोह के अंत में श्री राम सत्संग मंडल के संचालक वयोवृद्ध श्री विष्णु शरण अग्रवाल सर्राफ ने श्रोताओं तथा महाराज श्री का आभार प्रकट किया । आपने कहा कि हमारी संस्था विशुद्ध सात्विक भावों से भागवत कथा का आयोजन कर रही है। हमारा उद्देश्य मनोरंजन अथवा चमक-दमक और प्रदर्शन के फेर में पड़ना नहीं है । श्री विष्णु शरण जी के प्रयासों से कार्यक्रम समयबद्धता के साथ चलता है । आज भी जब 3:30 बजे के बाद दो-चार मिनट अधिक होने लगे ,तब विष्णु जी अपनी घड़ी देख रहे थे तथा चिंतित होकर इधर उधर प्रयत्नशील दिखाई पड़ने लगे । पाँच-सात मिनट की देरी से जब आचार्य श्री पधारे तो विष्णु जी यह कहने से नहीं चूके कि आपको देर हो गई ! आचार्य श्री मुस्कुरा दिए । समय के अनुशासन का प्रभाव इतना जबरदस्त था कि ठीक 6:30 बजे कथावाचक महोदय ने घड़ी देखकर विष्णु जी से पूछ लिया “क्या समय 6:30 का ही है ? ” । विष्णु जी ने कहा “हाँ” । कथावाचक महोदय ने पुनः प्रश्न किया “क्या एक भजन प्रस्तुत किया जा सकता है ?” विष्णु जी ने मुस्कुराते हुए कहा “जरूर प्रस्तुत करिए”। ऐसा अनुशासन आज के जमाने में जब कि लेटलतीफी हमारे सार्वजनिक जीवन का एक हिस्सा बनने लगी है ,अपने आप में प्रणम्य है ।
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लेखक : रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451

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