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22 Feb 2024 · 1 min read

बेसब्री

खुली फिज़ाओं में महकती एक शाम हो ।
तुम रहो मैं रहूं और हाथों में हाथ हो ।
फिर भटक आएंगे किसी डगर हम तुम ।
जहां सावन के झूले हों और हो बगिया में भंवरों की गुंजन ।
यूंही बैठ किसी खटिया पर तुम कोई गीत मुझे सुनाना ।
तोड़ बगिया से इक फूल तुम मेरे बालों में लगाना ।
और में , देख तुम्हें यूं ही मुस्कुराती रहूंगी ।
मेरे नटखट हरकतों से तुम्हें हसाती रहूंगी ।
देर शाम जब हम तुम अपने घर को लौटेंगे ।
बिछड़े हुए दो रस्तों पर जब हम खड़े होंगे ।
तब में अपने मन की व्यथा तुम्हे बताऊंगी ,
साथ मुझे तुम अपने ले चलो यह कहकर तुम्हें रुलाऊंगी ।
अपने सीने से लगाकर तुम,
फिर एक वादा करके चले जाओंगे ।
वतन की रक्षा के दायित्व के लिए ,
में तुम्हे रोक ना पाऊंगी ।
फिर एक बरस तक के इंतजार में,
हर सांझ द्वार तक आऊंगी ।

Language: Hindi
60 Views
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