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20 Jul 2016 · 1 min read

बुझती मशाल -जलतीं मशालें

परतंत्र-काल में जली
देश-भक्ति की मशाल
काजल की कोठरी में
पारने काजल लगी|

तयशुदा था कम जिसका
उजाले को बाँटना
स्नेह उसका सोख कर की
कर्णधारों ने ठगी|

नीव में जिसके शहीदी
भाव का गारा भरा
रक्त से सिंचित धरा की
हो रही है दिल्लगी|

तूं-तूं और जंग मैं मैं
राजनैतिक रंग ने
देश तोड़ा, जुडी केवल
व्यवस्था मुती-हंगी|

अब मशालें जल रहीं हैं
देशद्रोह आतंक की
राष्ट्र की रोकें प्रगति
यही दो बहनें सगीं|

Language: Hindi
Tag: कविता
134 Views
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