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9 Feb 2020 · 2 min read

*** ” बसंती-क़हर और मेरे सांवरे सजन……! ” ***

* नहीं न नहीं आज रुठो साजन..! ,
कंचन साज में सज-धज आई है बसंती ,
मेरे हृदय घर आंगन..।
यही है एक पावन मिलन की बेला.. ,
शायद…!
जिसे कहते हैं हर कोई..,
बसंतोत्सव की की मेला..।
गमन की बात न छेड़ो…,
जो तुम चाहो आज.. ,
ओ मुझसे ले लो….!
बासंती बयार प्यारी.. ,
बिछा गई है फुल-पलास-बिछौना..।
उपवन-कानन और..
ये चमन कली..! ,
चहक रही है जैसे..,
अलिंयन फेंके हैं कोई जादू-टोना..।
महक उठी है सब पर्णपात…,
और ये दसों दिशाएँ…।
ऐसे रंग-बसंती बहार में..,
कामदेव के संसार में… ;
रचाओ न अब कोई रास-लीलाएँ..।
हवन-पूजन की बात न छेड़ो..!
जो तुम चाहो आज…,
ओ मुझसे ले लो…!
नहीं न नहीं आज रुठो साजन….!!

** देखो..! पाई है महक ,
रसराज-बौर मंजरियाँ…!
झुमे डाली-डाली मधुप सजन…!
बनके जैसे कोई पागल साँवरिया…!!
पीली-पीली सरसों प्यारी.. ,
गदराई गेंहू की बाली…! ;
बजाये मौजों में.. ,
स्वागत-सरगम ताली..!
दशा देख समझ न पाये…,
बागियों की माली…!
भ्रमित मन से कह जाते…
” कहाँ से पाये ये मादक मदिरा की प्याली..। ”
लेकिन…!
कहे कवि बसंत बलदेव आवारा… ,
” एक-दो-तीन नहीं.. ,
सौ-सौ बार अपने आहों से पुकारा । ”
शायद….!
यही है रंग बसंती सौगात अनुपम लाली…!
हे साजन..!
अब सयन की बात न छेड़ो.. ,
जो चाहो आज… ,
ओ मुझसे ओ ले लो..!
नहीं न नहीं आज रुठो साजन…!!

*** पीर की तीर ” उर ” में न छेड़ो.. ,
ओ मेरे घनश्याम माली…!
छा गई अब घटा-घनघोर….,
बरसाओ न कोई ऐसा..
नीर-चीभोर-चीकोर…!
हे रंग लहरिया..! ,
ओ मेरे मनभावन-साजन सांवरिया..
आज बसंत की रात है..
रजनी प्रिय सखिरी मेरे साथ है…।
बैरी चाँद खेलत झांके… ,
मेरे नयनों की झिरकियाँ…!
चुनरी खींच सितारा ताना मारे..
रोकत रह गई मैं , सजनी बावरिया..!
माने नहीं…,
शोर मचावत नाच करे..,
ये कैसी हठी कर्णबाली झुमरियाँ..!!
कोयली कुहूकत ” कुहूक-कूहूक ” ,
कर गई ” उर ” में रंग रंगाई…!
नींदिया-बैरन भी सुधि न बिसराई.. ,
और कैसी निगोड़ी ये सेज निठराई…!
गमन की अब बात न छेड़ो…
जो चाहो तुम आज ओ मुझसे ले लो.!
नहीं न नहीं आज रुठो साजन…!!

**** हे साजन मन-पंछी छवी-छलिया…!
और प्रेम सलिल रस गगार…
अमर जीवन की…
रसिक-नीरज-घन-सागर-कांवर..!
गगन-भू-तल आज..
सौगात में ले लो.. ,
अब मुझे..
तुम अपने बांहों में ले लो…,
जो तुम चाहो आज ओ मुझसे ले लो..।।
लेकिन…..!
नहीं न नहीं आज रुठो साजन..!
कंचन साज में…
सज-धज आई है बसंती…!,
मेरे हृदय घर आंगन…!!
मेरे हृदय घर आंगन…!!

*****************∆∆∆****************

* बी पी पटेल *
बिलासपुर ( छ.ग.)

Language: Hindi
3 Likes · 1 Comment · 700 Views
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