प्यार काफ़ी है

मानता हूँ कि इस संसार में कई खामियां हैं
पर प्यार काफी है सब दूर करने के लिये
इन शाखों में कोई लफ्ज़ नहीं हैं
और जो हैं तो सिर्फ़ शिकायतें
आसमान कुछ ज़्यादा ही गहरा रहा है
बोझिल आँखें ताकि कुछ देख ना पायें
वो फूलों पर बिखरी शबनम और
धूप के बिना आधी खिली कलियाँ
वो पहाड़ों की परछाइयाँ और
समंदर की अँधेरी गेहराहियाँ
और ये दिन जो गुज़री बातों पर पर्दा करते हैं
कुछ भी उनके कदम डिगा नहीं सकता
उनकी सांसें ठहरा नहीं सकता
खालीपन अब महसूस नहीं होता
डर अब कुछ बदल नहीं सकता
ये जो प्यार करने वाले हैं
इनकी आँखों में जो ताकत बन उतरता है
वही प्यार काफ़ी है उन्हें एक करने के लिए
–प्रतीक

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