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पिता

पिता से ही है प्रकट पहचान मेरी इस धरा पर,
शीश पर प्रत्यक्ष जब तक उस गगन का हाथ है !
है नहीं चिंता किसी भी मोड़ पर कैसे चलूँगा,
शक्ति सारे विश्व की लगता कि मेरे साथ है ।।
जिस भरोसे दौड़ लेते राह में जलती चिता पर।
क्या लिखेगी कलम मेरी उस पिता पर ?

पिता वह साक्षात् ईश्वर जो न हारे अंत तक भी,
आंधियां प्रतिकूल कितनी, जीत लें जिसके सहारे ।
कब थका है, कब रुका है राह की उलझन से डरकर ?
झोंक दे जो शक्ति सारी, त्याग दे सुख-चैन सारे ।।
है कहाँ साहस कलम का जो लिखे उस देवता पर।
क्या लिखेगी कलम मेरी उस पिता पर ?

सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति भी तो वह पिता है,
पिता हैं परिवार का वटवृक्ष सा जो छाँव देता ।
द्वार ऐसा हर समस्या की जहाँ निष्पत्ति होती,
धैर्य, अनुशासन, मनुजता का सदा जो भाव देता ।।
चल रहे सीना फुला, संदेह कब अधिकारिता पर।
क्या लिखेगी कलम मेरी उस पिता पर ?

है नहीं करता प्रकट वह, भाव निज मन के सहज ही,
झांक कर देखो हृदय में अप्रदर्शित स्नेह-सागर ।
छोड़कर जिनको पिता, सुरलोक में जाकर बसे हैं,
मूल्य पूछो तो पिता का उन सभी से पास आ कर ।।
है नमन उस अनुग्रह को, गर्व हो उस श्रेष्ठता पर।
क्या लिखेगी कलम मेरी उस पिता पर ?

– नवीन जोशी ‘नवल’
बुराड़ी, दिल्ली

(स्वरचित एवं मौलिक)

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