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31 Mar 2023 · 1 min read

पिता की आंखें

देख कर तो लगता है,
ये आंखें बहुत कुछ सहतीं हैं।
कोई राज हो जैसे दफन इनमें,
चीख चीख कर कहतीं हैं ।।

जितना भी देखूं मैं इनमें,
सागर सी गहराई नजर आती है।
पर क्या ही करूं मैं आखिर,
पिता की आंखों को नाप नहीं पाती हैं।।

बस अब और शब्द नहीं मुझमें,
कि बयान में अपने सवाल कर पाऊं ।
देख आपकी सुंदर आंखें,
नई उम्मीद से जगमगा जाऊं ।।

©अभिषेक पाण्डेय अभि

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