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13 Sep 2016 · 1 min read

नारी

ईंट पत्थर गारा तै बणै मकान नै घर बनावै स वा,
फेर बखेर कै प्रेम की खुशबु घर नै महकावै स वा।

जन्म लेवे किते, बसे किते या हे कर्मा की गति स,
स वा ऐकली पर रूप घणे, हर रूप म्ह भावै स वा।

आड़े बेटी बन कै माँ बाप के आँगन म्ह उतरै स वा,
आपणी न्यारी प्यारी बाताँ तै घर नै चहकावै स वा।

थोड़ी सी स्याणी होज्या स जद वा सुख घणे देवे स,
माँ, दादी नै बिठा पलँग प खुद काम करै जावै स वा।

होवै ब्याह मान तै माँ बाप नै चिंता सतान लागै स,
देख चिंता म्ह माँ बाप नै बड़ां ज्यूँ बतलावै स वा।

मैं ना करवाऊँ ब्याह माँ री, कह दिए मेरे बाबू नै,
छोड़ के जाना पड़ोगे थम न्यू सुबकती पावै स वा।

ले फेरे सात वा फेर नयी जिंदगानी शुरू कर दे स,
साजन के संग आपणै घर सपना का बसावै स वा।

जै मिलज्या निर्भाग आगलै दुःख भारया होज्या स,
पर पी कै दुःख काच्चा, राजी सूं माँ नै समझावै स वा।

फेर धर कै कफ़न सिराहने अगले वंश बेल बढ़ावै स,
देवे घा औलाद उणै पर ना दर्द किसै नै बतावै स वा।

साच बात तै या स सारी उम्र दरदां म्ह कटै स उसकी,
पर सुलक्षणा फेर बी भगवान तै भरोसा ना ठावै स वा।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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