Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
15 Dec 2023 · 3 min read

नव-निवेदन

मंजिल ना सही कोई मुकाम तो दे दो…
इन भागते पैरों को थोड़ा विराम तो दे दो…

कभी भी कैसे भी एक अदद मदद नही
गिनके तिनके बराबर का सहारा भी नही ।
खुद ही बराबरी में आना गवारा भी नही
क्या इंसान ने इंसान कभी सँवारा ही नही ?

अब ‘साथी हाथ बढ़ाने’ का पैगाम ही दे दो…
मंजिल ना सही कोई मुकाम तो दे दो…

हाथों-हाथ हाथों में कुछ भी न थमा सके
कोई काम दे दो जो नाम-दाम कमा सके ।
ये हाथ किसी के आगे फैलाने से पहले
सर कुचलने वाले तलवे सहलाने पहले ।

इन बेगुनाह हाथों को कोई काम तो दे दो…
मंजिल ना सही कोई मुकाम तो दे दो…

बेगार, बेकार, बेरोजगार तो कहते ही हो
निठल्ला-निकम्मा-नौसिखुवा है भी कहो ।
अब ये निरा नालायक कहलाने से पहले
अभ्यर्थी लाभार्थी बना बहलाने से पहले ।

हुकूमती कागजों में कोई नाम तो दे दो…
मंजिल ना सही कोई मुकाम तो दे दो…

कब से ये काली रातें अंधेरी ही हैं रहती
ये भरी दोपहर भी अमावस सी हैं लगती ।
दिये जल ही न पाये बुझने का क्या गम
कर न सके रोशनी खुद जल के भी हम ।

घुप्प अंधेरे कोई दीवाली सी शाम तो दे दो…
मंजिल ना सही कोई मुकाम तो दे दो…

हमने जिंदगी नाम की थी जमाने के वास्ते
बड़े दोजख में भी हम ढूढ़ने चले थे रास्ते ।
हमें क्या पता था शराफत का नही जमाना
बस पैसा ही बन गया औकात का पैमाना ।

अब शराफत को कोई नया नाम तो दे दो…
मंजिल ना सही कोई मुकाम तो दे दो…

पथरा गई ऑखें पत्थर जब से तुम बने
बेरंग ही रह गए जब से रंगोली से सने ।
ये जमाने भर से यूं ही अटकी आस है
ये जिंदगी भर की लगी भटकी प्यास है ।

जमजम न सही ये ठुकराए जाम तो दे दो…
मंजिल ना सही कोई मुकाम तो दे दो…

इस गुमनाम सी बनी जा रही जिंदगी में
मजबूरी से भी न रसूखदारो की बंदगी में ।
जिदंगी की तासीर ही उलझ के रह गई
बेनामी को ही पहचान समझ के रह गई ।

दर्जा-ए-खास न सही दर्जा-ए-आम तो दे दो…
मंजिल ना सही कोई मुकाम तो दे दो…

इस जमाने में भी ऊँच-नीच की नीची सोच
समता,समानता,बराबरी लाने-करने में संकोच।
कब तक भेद-भाव के भाव यूं चढ़ाये रखोगे
कब कुप्रथाओं को गढ़े मुर्दे से गढ़ाये रखोगे ?

जहाँ बराबरी हो सबमें वो निजाम तो दे दो…
मंजिल ना सही कोई मुकाम तो दे दो…

आज नफरती जहर हवा में क्यों घुला हुआ
आग उगलने वालो का मुंह क्यों खुला हुआ?
क्यों आज आपस में हम लड़ने को तैयार
क्यों आज जुबां पे गाली हाथों में हथियार ?

भाईचारा रखे जो ऐसी कोई अवाम तो दे दो…
मंजिल ना सही कोई मुकाम तो दे दो…

ये गोली-बारूद, बम-धमाकों की बर्बादी से
ये देशों में युद्ध, आतंक और दहशतगर्दी से ।
ये होड़ विनाश के घातक शस्त्र-हथियारों से
ये छोटे बच्चों-औरतों,मानवता के हत्यारों से ।

इस बेचारी दुनिया को कही आराम तो दे दो…
मंजिल ना सही कोई मुकाम तो दे दो…

जहाँ संपति हो,सुख-शांति और खुशहाली हो
जहाँ नीति,नियम,न्याय,नियंत्रण बलशाली हो ।
इस सारे संसार को सुखी-संसार अगर दे दो
हे भारत भाग्य विधाता ! इतना तो वर दे दो ।।

कहाँ है रामराज्य वाले वही राम तो दे दो…
मंजिल ना सही अब कोई मुकाम तो दे दो…
~०~
(C)सर्वाधिकार सुरक्षित : जीवनसवारो.

Language: Hindi
2 Likes · 187 Views
📢 Stay Updated with Sahityapedia!
Join our official announcements group on WhatsApp to receive all the major updates from Sahityapedia directly on your phone.
Books from Jeewan Singh 'जीवनसवारो'
View all
You may also like:
प्रीति क्या है मुझे तुम बताओ जरा
प्रीति क्या है मुझे तुम बताओ जरा
निरंजन कुमार तिलक 'अंकुर'
अंधविश्वास का पोषण
अंधविश्वास का पोषण
Mahender Singh
यादें मोहब्बत की
यादें मोहब्बत की
Mukesh Kumar Sonkar
"महान गायक मच्छर"
Dr. Kishan tandon kranti
■ शुभ महानवमी।।
■ शुभ महानवमी।।
*Author प्रणय प्रभात*
If we’re just getting to know each other…call me…don’t text.
If we’re just getting to know each other…call me…don’t text.
पूर्वार्थ
कीमत क्या है पैमाना बता रहा है,
कीमत क्या है पैमाना बता रहा है,
Vindhya Prakash Mishra
मोहब्बत के शरबत के रंग को देख कर
मोहब्बत के शरबत के रंग को देख कर
Shakil Alam
🌻 *गुरु चरणों की धूल* 🌻
🌻 *गुरु चरणों की धूल* 🌻
जूनियर झनक कैलाश अज्ञानी झाँसी
गाँव सहर मे कोन तीत कोन मीठ! / MUSAFIR BAITHA
गाँव सहर मे कोन तीत कोन मीठ! / MUSAFIR BAITHA
Dr MusafiR BaithA
हरिगीतिका छंद विधान सउदाहरण ( श्रीगातिका)
हरिगीतिका छंद विधान सउदाहरण ( श्रीगातिका)
Subhash Singhai
पाती प्रभु को
पाती प्रभु को
Saraswati Bajpai
तिमिर है घनेरा
तिमिर है घनेरा
Satish Srijan
विकटता और मित्रता
विकटता और मित्रता
Astuti Kumari
24/251. *छत्तीसगढ़ी पूर्णिका*
24/251. *छत्तीसगढ़ी पूर्णिका*
Dr.Khedu Bharti
माँ लक्ष्मी
माँ लक्ष्मी
Bodhisatva kastooriya
मौन संवाद
मौन संवाद
Ramswaroop Dinkar
Humans and Animals - When When and When? - Desert fellow Rakesh Yadav
Humans and Animals - When When and When? - Desert fellow Rakesh Yadav
Desert fellow Rakesh
वक्त का सिलसिला बना परिंदा
वक्त का सिलसिला बना परिंदा
Ravi Shukla
हमेशा आंखों के समुद्र ही बहाओगे
हमेशा आंखों के समुद्र ही बहाओगे
कवि दीपक बवेजा
पुस्तक
पुस्तक
जगदीश लववंशी
अधूरी हसरतें
अधूरी हसरतें
Surinder blackpen
जय माता दी ।
जय माता दी ।
Anil Mishra Prahari
पेड़ लगाओ पर्यावरण बचाओ
पेड़ लगाओ पर्यावरण बचाओ
Buddha Prakash
बेटियाँ
बेटियाँ
Raju Gajbhiye
তুমি এলে না
তুমি এলে না
goutam shaw
बिन बुलाए कभी जो ना जाता कही
बिन बुलाए कभी जो ना जाता कही
कृष्णकांत गुर्जर
शायद मेरी क़िस्मत में ही लिक्खा था ठोकर खाना
शायद मेरी क़िस्मत में ही लिक्खा था ठोकर खाना
Shweta Soni
ତୁମ ର ହସ
ତୁମ ର ହସ
Otteri Selvakumar
लंका दहन
लंका दहन
Paras Nath Jha
Loading...