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25 May 2018 · 1 min read

दुनिया -ऐ- आतिशखाना ( ग़ज़ल)

गुज़रे में ज़िन्दगी के हमने यही है जाना ,

दुनिया कम नहीं किसी आतिश्खाने से।

शोले इतने कि जिसका कोइ शुमार नहीं,

अरमान जल रहे हैं किस कदर परवाने से।

शमाएँ पुकारती है उधर कर- कर के इशारे ,

उधर साक़ी कि सदायें आएं मयखाने से।

हफ़िज़े में छायी है बेइंतहा कशमकश ,

दिल भी बहलता नहीं लाख बहलाने से।

नागुज़िर है जग़ज़्ज़ुल के वाज़दां से दामन छुड़ा लुं ,

और दूर हो जाऊं इनके लपटों के तहखाने से।

तमन्ना है तलाश -ऐ-रहबर कि औ खुदा की ,

जो दिखा दे मुझे ज्यादा ऐ- तलब के नज़राने से।

दुनिया है वजहे-सद -खराबी आख़िरश यह माना,

फंसाती आई है अहल -ऐ -हवस को ज़माने से।

लाख काविशें करे यह आतिश्खाने कि चिंगारियाँ ,

होंसले ना मिट सकेँगे इनके लाख मिटाने से।

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