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8 Feb 2017 · 1 min read

दिल से उसके जाने कैसा बैर निकला

दिल से उसके जाने कैसा बैर निकला
जिससे अपनापन मिला वो ग़ैर निकला

था करम उस पर ख़ुदा का इसलिए ही
डूबता वो शख़्स कैसा तैर निकला

मौज-मस्ती में आख़िर खो गया क्यों
जो बशर करने चमन की सैर निकला

सभ्यता किस दौर में पहुँची है आख़िर
बंद बोरी से कटा इक पैर निकला

वो वफ़ादारी में निकला यूँ अब्बल
आँसुओं में धुलके सारा बैर निकला

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