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6 Oct 2016 · 1 min read

तकिया

खूबसूरत दुनियाँ में आने से पहले
माँ का गर्भ ही मेरा मात्र तकिया था
किसी शहनशाह के तख्तेताऊस सा
वो सर्वदा ऊँचा मुझे लगा करता था

स्मृतियाँ अस्तित्व की बुलबुलों बन
उठ सुंदर भूत में ले जाती है मुझको
जहाँ भूल मैं दुनियाँ की विद्रूपता को
चैन की नींद सोया करती थी रोज

खोल पलक रखा डग दुनियाँ में
अविरल तकियों को बदलती रही
कोख के तकिये में बेखटक सोयी
पा के कन्धे से लग कर मुस्कायी

कपड़े का तकिया मिला जब से
रंग बदलते हर पल जहाँ के देखे
सिरहाना कहूँ या तकिया दोनों ही
तब से आज तक मुझे न ये भाये

तकिया अच्छा लगता है बाहों का
वो ही सिरहाना मुझे बस भाता
दुनियाँदारी से दूर राहत दिलाता
हर पल वजूद का भास कराता

डॉ मधु त्रिवेदी

Language: Hindi
Tag: कविता
72 Likes · 392 Views
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