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जब चलती पुरवइया बयार

ग्रीष्म के तपते मौसम में
जब चलती पुरवइया बयार,
अब के एकाकी जीवन में,
जीवन के दोपहर में,
जब अंग-अंग बदरंग,
न पचता मीठा-तीखा,
न खाता तेल-मशाला,
जब जीवन जेल-सरीखा।
तब आती धुंधली-सी याद,
बचपन की मीठी बात,
न चिंता पढ़ने-लिखने की,
न चिंता खाने-पीने की,
बारिश हो तो धूम मचाना,
छप-छप करते दौड़ लगाना,
कागज की फिर नाव चलाना,
छोटे मेढक को खूब तैराना।
आती ये मीठी याद,
जब चलती पुरवइया बयार।

मौलिक व स्वरचित
©® श्री रमण
बेगूसराय (बिहार)

6 Likes · 10 Comments · 173 Views
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