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16 Sep 2016 · 1 min read

गज़ल

बहर–1222 1222 1222 1222, क़ाफ़िया – आ, रदीफ़–हुआ होगा

[गज़ल]

कहीं बातें, हुई होंगी, कहीं वादा, हुआ होगा
निगाहों ही निगाहों में,कोई अपना हुआ होगा
मुहब्बत यूं नहीं चलती, बिना रफ़तार की आँधी
कहीं तो बह रहा दरिया, किनारा भी हुआ होगा॥
मुकामे दौर को देखे, उमर नादान बन जाती
अभी तो इक गिला आई, तड़फ जाया हुआ होगा॥
बहारें ही पता देंगी, जरा उस बाग में जाओ
जहां कलियाँ खिली होगी, वहीं भौरा हुआ होगा॥
जमाने की नजर बचके, चली होगी ये पुरवाई
सितम खामोश है देखों, कयामत भी हुआ होगा॥
किसी ने चाह ना देखी, दिलों की बात दिल जाने
अरे गौतम नजर बदलों, निशाना भी हुआ होगा॥
मछलियाँ टांग दी जाती, निशाने तीर चल जाते
बहें जब आब आँखों से, बहाना भी हुआ होगा॥

महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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