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3 May 2024 · 1 min read

ग़ज़ल

जो भी हमने किया-धरा है ।
बीमारी बनकर लौटा है ।

हुई रश्म़ पूरी निकाह की,
मग़र जिस्म आधा-आधा है ।

चमक रही है काल-कोठरी,
छत पर अँधियारा छाया है ।

नफ़रत फैली मंदिर – मंदिर,
मस्ज़िद-मस्ज़िद डर फैला है ।

ताल ठोककर दावा करते,
जिनने उसे नहीं देखा है ।

ईश्वर के अपवाद बहुत हैं,
सच का ‘ईश्वर’ छुपा हुआ है ।

—- ईश्वर दयाल गोस्वामी ।

Language: Hindi
2 Likes · 51 Views
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