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26 Jun 2016 · 1 min read

क्यों लड़ना और लड़ाना है

परवाना ये दीवाना है
लेकिन उसको जल जाना है

मकड़ी के जाले सी दुनिया
सबको इसमें फंस जाना है

गम इतने हैं आमजनों के
अब छलक रहा पैमाना है

जाने ध्यान कहाँ है भटका
क्यों लगता नहीं निशाना है

सब लोग यहाँ हैं इक जैसे
क्यों फिर शोर मचाना है

जब तक रहो प्यार से रह लो
क्यों लड़ना और लड़ाना है
रचना: बसंत कुमार शर्मा, जबलपुर

3 Comments · 434 Views
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