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15 May 2023 · 1 min read

कोई अपनों को उठाने में लगा है दिन रात

कोई अपनों को उठाने में लगा है दिन रात
कोई अपनों को गिराने में लगा है दिन रात

कोई दुनिया की हिफाज़त के लिए है बेचैन
कोई दुनिया को जलाने में लगा है दिन रात

कोई रिश्तों के लिए जीता है मरता है यहां
कोई रिश्तों को मिटाने में लगा है दिन रात

घर की बुनियाद हिला कर कोई खुश है बेहद
कोई घर-बार सजाने में लगा है दिन रात

कोई रखता है अंधेरों को मिटाने में यकीं
कोई सूरज को बुझाने में लगा है दिन रात

— शिवकुमार बिलगरामी

1 Like · 250 Views
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