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Mar 21, 2019 · 1 min read

काष्ठकार हैं कहलाते

कोई कहे बढ़ई कोई कहता है खाती
कोई हमको कहता है सुतार
लकड़ी है हमारी रोजी रोटी
हम कहलाते हैं काष्ठकार
????
मिला हमें पूर्वजों से विरासत में
काष्ठकारी का अनूठा धंधा
वनों की कटाई मानव का
दुष्कृत्य
जिसने किया हमारा काम मंदा।
????
हम लकड़ी के बाजीगर हैं बंधु
लकड़ी की कृतियां गढ़ते हम
परिश्रम से जीविका कमाते
नहीं करते भिक्षा वृत्ति हम।
????
यह माना कि हम हैं निर्धन
काया से मजबूत न हम।
किन्तु सुबह शाम की रोटी
मिल जाती करते हम श्रम।
????
कर्मशील हैं अकर्मण्य नहीं हम
जो किस्मत से जोड़ें नाता।
किस्मत के भरोसे हम न बैठें
मेहनत की हैं खाते हरदम।
??
कमजोर सही दमदार हैं हम,
है हमारे बाहुबल में दम।
हम न हारेगें मेहनत से,
खुद हारेगा हम ही से श्रम।
??
हाथों में देखो चुभ रहा है घर्षण ,
राहें हमारी पथरीली न हैं नर्म।
राहों के रोड़े खुद चुन फेंकेंगे,
खुद के काम में कैसी शर्म
????
अपने मरे ही स्वर्ग है मिलता,
समझ लिया जीवन का यह मर्म।
अपने भुजबल पर है हमें भरोसा,
शुद्ध हृदय से करेंगे अपना कर्म।
????

रंजना माथुर
अजमेर (राजस्थान )
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

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