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22 May 2024 · 1 min read

कथनी और करनी

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कथनी और करनी में अंतर न करके,
छोटे-छोटे संकल्पों से शुरुआत करनी चाहिए।

न हो बड़ी-बड़ी बातें आदर्शों की,
व्यावहारिक सी सहज अभिव्यक्ति होनी चाहिए।

घुटने लगी हैं साँसे बंद वातानुकूलित संकीर्ण कमरों में,
उन्मुक्त हवा में विस्तृत सोच होनी चाहिए ।

औपचारिकताओं से घिरे दिवसों का नहीं कोई औचित्य,
हर रोज़ ही संस्कारित दिवस मना लेना चाहिए ।

तारीफों की जंजीरों में कब तक जकड़े रहेंगे ख़ुद को ,
ज़रा आलोचना का भी लुत्फ़ उठाना आना चाहिए ।

पनप गए हैं समाज के ठेकेदार खरपतवार से,
पड़ोस की बेटी का विश्वासपात्र भी बन जाना चाहिए ।

माना कि महारथ हासिल हो गई है हमें,
नवांकुरों को भी पनपने का अवसर देना चाहिए।

न हो केवल किताबी लेखन और पठन
लिखकर,लिखे हुए की पुनरावृत्ति कर मनन भी कर लेना चाहिए।

कथनी और करनी में अंतर न करके,
छोटे-छोटे संकल्पों से ही शुरुआत करनी चाहिए।

डॉ दवीना अमर ठकराल ‘देविका’

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