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Oct 9, 2016 · 1 min read

एहराम

वो कोई और नाम लिख रहा था मेरे नाम पर
परदा डाल दिया मेरे वजूद के एहराम पर

बडी शिद्दत से जी रही थी जिन पलो को मै
कालिख ही पोत दी हमारी सुनहरी शाम पर

हर दर्द उसका खुद पर झेल आये हम
रह गये आज तन्हा अपने मुकाम पर

जिसको सौंपी थी वफा बिना किसी मोल
उसने दफन कर दी “प्रीति” उसूलो के दाम पर

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