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30 Apr 2022 · 1 min read

इश्क़ में जूतियों का भी रहता है डर

पीठ पर पति के इतना क्यूँ सामान है
कोई गदहा नहीं यह भी इंसान है

रोड पर झूमना इक हुनर है हुनर
बिन पिये जो चले वह तो नादान है

इश्क़ में जूतियों का भी रहता है डर
ये सफर तो नहीं इतना आसान है

बेचकर बाप का धन लुटाता है जो
अपने घर का वही सच में सुल्तान है

तेल तो ब्रांड का ही लगाते थे तुम
क्यों चमन हो गया इतना वीरान है

दाग लाया हूँ फिर मैं तो बाजार से
कौन आखिर वहाँ बेचता पान है

पाँव ‘आकाश’ बीवी के पड़ने लगा
तबसे घर में न उसके घमासान है

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 30/04/2022

10 Likes · 10 Comments · 1115 Views
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