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8 Jun 2016 · 1 min read

इधर फितरत बदलती जा रही है

इधर फितरत बदलती जा रही है
उधर उल्फत बिखरती जा रही है

इमारत ऊँची ऊँची थाम कर अब
कमर धरती की झुकती जा रही है

चढ़ा कर स्वार्थ का चश्मा नज़र पे
नमी आँखों की पुछती जा रही है

समय के साथ देखो ज़िन्दगी भी
किये बन्द आँख चलती जा रही है

कभी रिश्तों भरी होती थी दुनिया
एकाकी आज बनती जा रही है

यहाँ पर ‘अर्चना’ के नाम कितने
ये दुनिया ढोंग करती जा रही है

डॉ अर्चना गुप्ता
मुरादाबाद(उ प्र)

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