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इंसान ही अकेला है

लोग साथ है
सड़क भरे है
इंसानों के भीड़ में
इंसान ही अकेला है

नई रांहे
अमर उजाले
है दिशा नई
फिर भी
खोया इंसान है

फैलाएं बाहें
सूरज ताक रहा
आनंद की
मूर्ति बना रहा
शुरू कर
अध्याय नया
नया साल जो
आ रहा,

खो मत जाना
भीड़ में
दुनिया के
चकाचौन्ध में
इंसान के भीड़ में
इंसानियत को
न खोना

ज़िन्दा रख
इंसान को
बना अपनी
पहचान को
शुरुवात कर
आगे बढ़
विकारों से
विजयी हो…

– आनंदश्री

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