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2 Feb 2024 · 1 min read

आईने में …

आज उम्र के इस पड़ाव पर
देखती हूँ जब भी आईना
न जाने क्यों
एक बूढ़ी स्त्री नज़र आती है
कभी मुस्कुराती व कभी
धीरज सा बँधाती है।
कभी मुख पर चिंता की
रेखा भी दिख जाती है।
कभी कभी ये मुझे
अहसास भी दिलाती है
कि बच्चों की बेरुखी
माँ बाप को असमय
बूढा कर जाती है।

अब मैं उठती हूँ अक्सर
घुटना पकड़ कर
करती हूँ मिन्नतें बच्चों से अपने
आ जाना घर ज़रा जल्दी इस बार
फीके लगते हैं तुम बिन त्यौहार।
फिर करती हूँ उनकी व्यस्तता की फ़िकर
खुश हैं अपने घर में, मनाती शुकर।
छुपाती हूँ उनसे हरेक अपना गम
अगर दर्द हो तो भी मुस्काती हरदम।
अकेलापन जब ये मुझको सताता है
अनजाना सा डर क्यों मुझे घेर जाता है।

याद मुझे आती है वो आईने की औरत
अरे वो तो है मेरी माँ की ही सूरत
मेरा साथ देने वो मेरे पास आ गई है
धीरे धीरे मेरी माँ मुझ में समा गई है।

डॉ मंजु सिंह गुप्ता

Language: Hindi
1 Like · 82 Views
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