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15 Feb 2017 · 1 min read

आँख मेरी चौधिंयाये रौशनी इतनी न दे

आँख मेरी चौधिंयाये रौशनी इतनी न दे
राह भटकूँ मैं मुझे तू तीरग़ी इतनी न दे

ग़म अता करना फक़त उतना उठा लूँ मैं जिसे
आँख से बाहर निकल जाये खुशी इतनी न दे

दर्द देना है खुदा तो मुझको देना शौक़ से
किन्तु माँ की आँख में हरपल नमीं इतनी न दे
साथ अपनों का दिलाना तू मिरे मौला मुझे
बोझ बन जाऊं किसी पर जिंदगी इतनी न दे
चाँद – तारों से सजी महफ़िल न मुझको चाहिए
और मैं तड़पूँ अकेली बेबसी इतनी न दे

बबीता अग्रवाल #कँवल

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