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24 Jan 2017 · 1 min read

अपने होने का अहसास

मैं ढूँढ रहा था जिसे
अंतरिक्ष के उस पार
या सांसों से भी करीब
अंतर्मन के आस पास

क्यों विचलित करती है मुझे
शांति की यूँ बढती प्यास
प्रतिबिंब सा है सच का चेहरा
लक्ष्य की झूठी सी एक आस

क्यों लुभा नहीं पाती हमें
हर घूँट की मधुर मिठास
क्यों तृप्त नहीं करती हमें
सिर्फ अपने होने का अहसास

Language: Hindi
234 Views
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