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5 Oct 2021 · 2 min read

अन्नदाता,तू परेशान क्यों है…?

अन्नदाता,तू परेशान क्यों है…?

जिसने तुम्हारे खून पसीने की कमाई,
सदा ही मिल बांट कर खाई,
तेरे मेहनत की कमाई से,
अपनी महलें है बनवाई ।
समझो तो सही,वो आढ़तिया ही !
भला तुझ पर मेहरबान क्यों हैं..?

अन्नदाता, तू परेशान क्यों है…?

कौड़ी के मोल फसल बेच,
सूली पर चढ़ जाते थे किसान।
अब उन्हें ही पंख फैलाकर ,
अपने सपनों की उड़ान पूरी करने में,
इतनी घबराहट क्यों है ?
अब तो सामने खुला आसमान है ।

फिर भी अन्नदाता, तू परेशान क्यों है…?

याद कर तू अतीत को,
जब इन गिद्धों की टोली द्वारा,
कहा जाता था कि ,
किसान अपनी फसलों को ,
औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर क्यों है?
इन्हें तो खुला आसमान चाहिए ,
अब वो ही अपनें लफ़्ज़ों पे बेईमान क्यों है…?

अन्नदाता, तू परेशान क्यों है…?

फसल उपजाना मन से ,
पर दूर रहना कपटी राजनीतिज्ञों और जयचंदों से।
संविदा खेती तो कोई ,
अनिवार्य शर्त नहीं है सबके लिए।
न्युनतम समर्थन मुल्य ,
कभी खत्म नहीं होनेवाली ।
इन सब बातों को जानते हुए भी तू अनजान क्यों है ?

अन्नदाता, तू परेशान क्यों है…?

कुटिल राजनीतिज्ञों के झांसे में मत आना ..!
वो तो हैवान है ।
सोच तू जरा…
जो करते सदा स्वार्थ की खेती ,
उन्हें फसलों की खेती से क्या मतलब ।
वो भला तेरे लिए दे रहे बलिदान क्यों हैं… ?

अन्नदाता, तू परेशान क्यों है…?

देश तोड़ने वालों अराजक तत्त्वों से मिलकर ,
राहगीरों का सर डंडे से कुचलने वाले ,
भिंडरावाला के चित्रोंवाले टीशर्ट पहन ,
सड़कों पर आतंक मचाने वाले ,
किसान तो नहीं हो सकते ।
ये सब जानते हुए भी सारा देश हैरान क्यों है…?

अन्नदाता, तू परेशान क्यों है…?

मौलिक एवं स्वरचित
सर्वाधिकार सुरक्षित
© ® मनोज कुमार कर्ण
कटिहार ( बिहार )
तिथि – ०५ /१०/२०२१
मोबाइल न. – 8757227201

Language: Hindi
6 Likes · 8 Comments · 1517 Views
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