समझने की बात बस इतनी है कि
अपने दोषों पर पर्दा डालने के लिए वह दूसरों की कमियों पर उंगली उठाने में सबसे आगे रहता है। ठीक वैसे ही जैसे चोर की दाढ़ी में तिनका, जिसे अपने ही किए का डर भीतर ही भीतर खाए जाता है।
जब वही काम वह खुद करता है, तो उसे “परिस्थिति” या “मजबूरी” नाम दे देता है।
लेकिन वही काम कोई दूसरा करे तो अचानक वह “गलत”, “अनुचित” और “अस्वीकार्य” बन जाता है। यही दोहरा मापदंड इंसान के भीतर की सच्चाई उजागर कर देता है।
सच तो यह है कि व्यक्ति की सोच वही होती है जैसा उसका चरित्र होता है।
जिसके मन में ईर्ष्या होगी, वह दूसरों की सफलता देखकर जल उठेगा।
जिसके भीतर कपट होगा, वह दूसरों की नीयत पर शंका करेगा।
और जिसके भीतर अच्छाई होगी, वह हर जगह अच्छाई ही ढूँढ़ेगा।
इसीलिए कहा गया—
“मन जैसा—दुनिया वैसी।”
इंसान दुनिया को नहीं बल्कि अपने भीतर के भावों को दूसरों पर थोपकर देखता है।
समझने की बात बस इतनी है कि
दूसरों पर आरोप लगाने से पहले
अपने मन के आईने में एक बार झाँक लेना चाहिए।
क्योंकि दुनिया उतनी खराब नहीं है,
जितनी हमारी सोच उसे बना देती है। एक बार झाँक लेना चाहिए।
क्योंकि दुनिया उतनी खराब नहीं है,
जितनी हमारी सोच उसे बना देती है।
जय श्रीराम