प्रोफेशनल वाद (भावुक, कार्यकारी, आणि व्यवसायिक )

डॉ अरूण कुमार शास्त्री एक अबोध बालक अरूण अतृप्त
आलेख (प्रोफेशनल वाद )
पौराणिक संसार को देखने से यही ज्ञान होता है कि पहले सभी लोग भावनात्मक प्रवृत्ति के होते थे और उसी परिवेश के अनुसार उनके कार्य, सम्बन्ध परिलक्षित होते थे , वे तब आपसी संबंध को संभालते थे। उनका मान रखते थे और अपनी संतान को भी यही शिक्षा देते थे। भावनात्मक संबंधो को समर्पित भाव से जीना सिखाते थे। लेकिन धीरे धीरे परिस्थितियों के चलते वही, बाद मे लोग प्रॅक्टिकल हो गये । तब वो संबंध का फायदा उठाने लग गए। अर्थात उनके माध्यम से अपने कार्य स्वार्थ आदि की सिद्धि, लाभ प्राप्त करना और नहीं तो सामाजिक साहित्यक व्यक्तिगत पारिवारिक प्रकरण आदि में कोई विशेष समीपता निहित योग। और अब तो बिना किसी व्यवसायिक लाभ मिले बिना कोई सम्बन्ध होता हो ऐसा देखा ही नहीं । अब आपको अपनी रचना सामग्री के लिए एक लाईक के लिए भी किसी से तभी अपेक्षा करें कि जब आप उनकी रचना को लाईक करें अन्यथा कुछ भी लिखिए आपको लाईक तो दूर व्यू भी नहीं मिलेगा। तो मैं ये कह रहा था कि अब तो लोग प्रोफेशनल हो गए – तू मेरी को पसंद कर तो ही मैं तेरी को पसंद करूंगा अन्यथा तू चाहे कित्ता कुछ लिखता जा पोस्ट कर, मैं धोरे भी नहीं फटकूँगा।फायदा अगर है तो ही संबंध बनाने में प्रवर्तक होगा व्यक्ति अर्थात आप का ज्ञान विज्ञान प्रेम प्यार, शिक्षा निरस्त। कोई बीमार है कोई गिर गया है कोई तकलीफ में है लेकिन लोग उसकी मदद करने तभी उदृत होंगे जब तुलनात्मक अध्ययन कर लेंगे कि फलाने ने कब और कितनी बार उसकी बीमारी में, कब कब उसको गिरने पर, कहां कहां तकलीफ में या कब कब उसके बच्चों के जन्म दिवस पर सालगिराह इत्यादि पर उसको कितने मूल्य का आदि आदि मतलब आप समझ रहे है न भाई साहब।
*सुप्रभात. नमस्कार प्रणाम आदि प्रातः काल के संबोधन में भी ये प्रोफेशनलवाद ऐसा क्रियात्मक हुआ है कि अब इसका प्रचार परचम लहराया जाए या नहीं मनुष्य इसमें भी लाभ हानि देख कर ही घुसा करता है। एक विचार है उसको मैंने एक लेख के माध्यम से आपको समर्पित किया।
आपका दिन मंगलमय हो