बने स्वयंभू आप

श्रुतियों को कर अनसुना
वेद बाहरे होय ,
सैया पर है जब पड़ा
अब पछताना कोय I
था अनीति ही धर्म जब
नीति कहाँ से भाय,
लगी किनारे नाव जब
पढ़े वेद का भाष्य I
सिंधु पार की चाह है
ले कागज की नाव ,
है उद्दात्त उद्देश्य पर
नहीं त्याग का भाव।
रखा पाहरे चोर है
भावे दुष्टजन तोय ,
रक्षक ही भक्षक बने
भला कहाँ से होय ?
लिये सिफारिश पर जना
काज कहाँ से होय ?
डूबन जब तू लागियों
तुम्हें बचाए कौन ?
नाव पडी जब भँवर में
तब आये हरि याद ,
काम बिगाड़े स्वयम ही
व्यर्थ करे फ़रियाद।
निंदा गुरु की ना करो
सदा झुकाओ माथ ,
जिस पर बैठो थे कभी
मत काटो उस डार।
पिता सरीखा मैं रहा
तुमको सदा सिखाय,
सीख गांठ नहि बांधें थे
क्यों कर अब पछताय।
निर्मेष जगत की रीति है
बने स्वयंभू आप ,
मार पडी जब ईश की
याद करे तब बाप।
निर्मेष