दोहा पंचक. . . . सूक्ष्म
दोहा पंचक. . . . सूक्ष्म
पंछी पिंजर तोड़ जब, चला गगन के पार ।
तब उसको आया समझ , कैसा यह संसार ।।
बिना पंख संभव नहीं, तेरी विहग उड़ान ।
करें हौसले व्यर्थ जब, आते हैं व्यवधान ।।
बिना हौसले के नहीं, संभव गगन उड़ान ।
कर्म पंख से ही मिले , जीवन को पहचान ।।
मौन मुसाफ़िर उड़ चला, छोड़ देह का गाँव ।
अम्बर-अम्बर ढूँढता, उस दाता की ठाँव ।।
बड़ी अजब है सृष्टि में, जीवन की तासीर ।
नश्वर देखे मौन में , उड़ता सूक्ष्म शरीर ।।
सुशील सरना / 20-1-25